Salt making by evaporating water of the Sambhar lake in the large panes has been a consistant activity since ages of the people in this region of Rajpootana comprised of several villages surrounding it and inhabited by all castes, particularly the Jats. The activity picked up pace when in 1802 the British East India Company created the Department of Salt and later the Office of the Salt Commissioner (now located in Jaipur) thereby regulating the salt manufacturing and trading. It also levied a tax, called Salt Tax. Salt is an essential commodity without which our food is incomplete and remains distasty. However, the salt making takes a heavy price that starts from exploitation of human laabor force to withering of human bodies and the ambiant environment. The day I visited the lake area and found people making salt, there was hardly a drop of water in the lake that is 40 miles long and about 20 miles wide (please don't trust Google Earth's imageries as they might be older than you think). The people were clever to dig bore deep-wells and draw brackish water in greater quantities than the nature would have provided or anybody could envisage. When it rained in the catchments, large volume of water used to fill the lake bed from which people used to make salt in the summer months. The activity starts from early morning and continues until noon when due to excessive harshness of weather, rest is permitted until it cools down and starts again around 4 PM, which may go upto 7 in the evening. Nowadays, people see more profit in salt making than raising crops or rearing cattle because there is hardly any bush in the jungle. Farmers have taken to converting their agricultural land into panes for making salt. It was told that the owners sell the salt at 73 paisa a kilogram to the traders and industrialists. Compare this with market price of Rs.20/kg. Astounding revelation of harsh truth.
Hanumaan
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Friday, 13 April 2012
Monday, 2 April 2012
शुक्रिया रणबीर जी,
मेरा विरोध सीधा ’आधुनिकता’ के मूल्य से नहीं था, बल्कि आधुनिकता की जो समझौतावादी मिलावटी नकल हमने तैयार की, उससे था. यह सामन्ती व्यवस्था का विरोध करने की जगह उससे गठबंधन के आधार पर विकसित हुई. ’पान सिंह तोमर’ में मैं इसके कई चिह्न देख पाता हूँ. आपने इतनी तल्लीनता से आलोचना को पढ़ा, उसका शुक्रिया. इन प्रतिक्रियाओं से मेरे लेखन और विचारों को बल मिलता है.
...मिहिर.
प्रिय मिहिर,
प्रतुत्तर के लिये शुक्रिया. हो सकता है मेरे कथन में त्रुटी रही हो लेकिन आपका विश्लेषण एकदम सटीक था. सिनेमा की विधा के जरिये अपने समाज के जिन छिपे हुए मनान्दोलनों को अक्सर हम नज़रंदाज़ करके चलते हैं वे ही पान सिंह तोमर जैसे सच्चे आदमिओं में शोलों के रूप में विकसित होकर प्रज्वलित होते हैं लेकिन इसमें विनाश तो बहुत अपनों का ही होता है. राज्य की मशीनरी तो केवल उस परिणति के मात्र एक जरिये के रूप में हमारे सामने आती है. वास्तव में पुलिस और प्रशासन की उत्पत्ति जिस कार्य के लिये हुई उसमें पान सिंह तोमर जैसों को एलिमिनेट करना शामिल नहीं होना चाहिये था. किसी ने पान सिंह जैसों के दर्द को संशोधित करने का प्रयास नहीं किया. नहीं तो उसके बागी बनने की कोई वजह नहीं होती.
Sunday, 1 April 2012
Paan Singh Tomar -Cinema ya adhunik hotay bharat ki jhoothi vyavastha par ek prahar
आधुनिक राज्य के झूठे वादों की कहानी है पान सिंह तोमर
28 March 20127 Comments
♦ मिहिर पंड्या
‘पान सिंह तोमर’ अपने दद्दा से जवाब मांग रहा है। इरफान खान की गुरु-गंभीर आवाज पूरे सिनेमा हाल में गूंज रही है। मैं उनकी बोलती आंखें पढ़ने की कोशिश करता हूं। लेकिन मुझे उनमें बदला नहीं दिखाई देता। नहीं, ‘बदला’ इस कहानी का मूल कथ्य नहीं। पीछे से उसकी टोली के और जवान आते हैं और अचानक विपक्षी सेनानायक की जीवनलीला समाप्त कर दी जाती है। पान सिंह को झटका लगता है। वो बुलंद आवाज में चीख रहा है, “हमारो जवाब पूरो न भयो।”
अचानक सिनेमा हाल की सार्वजनिकता गायब हो जाती है और पान सिंह की यह पुकार सीधे किसी फ्लैश की तरह आंखों के पोरों में आ गड़ती है। हां, इस कथा में ‘दद्दा’ मुख्य विलेन नहीं, गौण किरदार हैं। दरअसल यह कथा सीधे बीहड़ के किसान पान सिंह तोमर की भी नहीं, वह तो इस कथा को कहने का इंसानी जरिया बने हैं। यह कथा है उस महान संस्था की जिसके ‘संगे-संगे’ पान सिंह तोमर की कहानी शुरू होती है और अगले पैंतीस साल किसी समांतर कथा सी चलती है। भारतीय राज्य, नेहरूवियन आधुनिकता को धारण करने वाली वो एजेंसी जिसके सहारे आधुनिकता का यह वादा समुदायगत पहचानों को सर्वोपरि रखने वाले हिंदुस्तानी नागरिक के जीवन-जगत में पहुंचाया गया, यह उसके द्वारा दिखाये गये ध्वस्त सपनों की कथा है। उन मृगतृष्णाओं की कथा, जिनके भुलावे में आकर पान सिंह तोमर का, सफलताओं की गाथा बना शुरुआती जीवन हमेशा के लिए पल्टी खा जाता है।
यह अस्सी के दशक की शुरुआत है। गौर कीजिए, स्थानीय पत्रकार (सदा मुख्य सूचियों से बाहर रहे, गजब के अभिनेता ब्रिजेंद्र काला) पूछता है सूबेदार से, डकैत बने पान सिंह से, “बंदूक आपने पहली बार कब उठायी?” और पान सिंह का जवाब है, “अंगरेज भगे इस मुल्क से। बस उसके बाद। पंडित जी परधानमंत्री बन गये, और नवभारत के निर्माण के संगे-संगे हमओ भी निर्माण शुउ भओ।” गौर कीजिए, अपने पहले ही संवाद में पान सिंह इस आधुनिकता के पितामह का न सिर्फ नाम लेता है, उनके दिखाये स्वप्न ‘नवभारत’ के साथ अपनी गहरी समानता भी स्थापित करता है।
पश्चिमी आधुनिकता की नकल पर तैयार किया खास भारतीय आधुनिकता का मॉडल, जिसमें मिलावटी रसायन के तौर पर यहां की सामंती व्यवस्था चली आती है। यह अर्ध सामंती – अर्ध पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य संस्था की कथा है, जिसकी बदलती तस्वीर ‘पान सिंह तोमर’ में हर चरण पर नजर आती है। मुख्य नायक खुद पान सिंह तोमर इसी पुरानी सामंती व्यवस्था से निकलकर आया है और आप उसके शुरुआती संवादों में समुदायगत पहचानों के लिए वफादारियां साफ पढ़ सकते हैं। अफसर द्वारा पूछे जाने पर कि क्या देश के लिए जान दे सकते हो, उसका जवाब है, “हां साब, ले भी सकते हैं। देस-जमीन तो हमारी मां होती है। मां पे कोई उंगली उठाये तो का फिर चुप बैठेंगे?” और यहीं उसके जवाबों में आप नवस्वतंत्र देश के नागरिकों की उन शुरुआती उलझनों को भी पढ़ सकते हैं, जो राज्य संस्था, उसके अधिकार क्षेत्र और उसकी भूमिका को ठीक से समझ पाने में अभी तक परेशानी महसूस कर रहे थे। पूछा जाता है पान सिंह से कि क्या वो सरकार में विश्वास रखता है, और उसका दो टूक जवाब है, “ना साब। सरकार तो चोर है। जेई वास्ते तो हम सरकार की नौकरी न कर फौज की नौकरी में आये हैं।”
स्पष्ट है कि पान सिंह के लिए राज्य द्वारा स्थापित किये जा रहे आधुनिकता के इस विचार की आहट नयी है। लेकिन यह विचार सुहावना भी है। अपने समय और समाज के किसी प्रतिनिधि उदाहरण की तरह वो जल्द ही इसकी गिरफ्त में आ जाता है। और इसी वजह से आप उसके विचारों और समझदारी में परिवर्तन देखते हैं। यह पान सिंह का सफर है, “हमारे यहां गाली के जवाब में गोली चल जाती है कोच सरजी” से शुरू होकर यह उस मुकाम तक जाता है, जहां गांव में विपक्ष से लेकर अपने पक्ष वाले भी उसका बंदूक न उठाने और बार-बार कार्यवाही के लिए पुलिस के पास भागे चले जाने का मजाक उड़ा रहे हैं। अपने-आप में यह पूरा बदलाव युगांतकारी है। और फिल्म के इस मुकाम तक यह उस नागरिक की कथा है, जो आया तो हिंदुस्तान के देहात की पुरातन सामंती व्यवस्था से निकलकर है, लेकिन जिसको आधुनिकता के विचार ने अपने मोहपाश में बांध लिया है। जिसका आधुनिक ‘राज्य’ की संस्था द्वारा अपने नागरिक से किये वादे में यकीन है। वह उससे उम्मीद करता है और व्यवस्था की स्थापना का हक सिर्फ उसे देता है।
विचारक आशीष नंदी भारतीय राष्ट्र-राज्य संस्था पर बात करते हुए लिखते हैं, “स्वाधीनता के पश्चात उभरे अभिजात्य वर्ग की राज्य संबंधी अवधारणा राजनीतिक रूप से ‘विकसित’ समाजों में प्रचलित अवधारणा से उधार ली गयी थी। चूंकि हमारा अभिजात्य वर्ग राज्य के इस विचार में निहित समस्याओं से अनभिज्ञ नहीं था, इसलिए उसने भारत की तथाकथित अभागी और आदम विविधताओं के साथ समझौता करके थोड़ा मिलावटी विचार विकसित किया।” यही वो मिलावटी विचार है, जहां आधुनिकता के संध्याकाल में वही पुराना सामंती ढांचा फिर से सर उठाता है और ठीक यहीं किसी गठबंधन के तहत राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है।
इसीलिए, फिल्म में सबसे निर्णायक क्षण वो है, जहां पान सिंह के बुलावे पर गांव आया कलेक्टर यह कहकर वापस लौट जाता है, “देखो, ये है चंबल का खून। अपने आप निपटो।” यह आधुनिकता द्वारा दिखाये उस सपने की मौत है, जिसके सहारे नवस्वतंत्र देश के नागरिक पुरातन व्यवस्था की गैर-बराबरियों के चंगुल से निकल जाने का मार्ग तलाश रहे थे। फिर आप राज्य की एक दूसरी महत्वपूर्ण संस्था ‘पुलिस’ को भी ठीक इसी तरह पीछे हटता पाते हैं। यहीं हिंदुस्तानी राष्ट्र-राज्य संस्था और उसके द्वारा निर्मित खास आधुनिकता के मॉडल का वो पेंच खुल कर सामने आता है, जिसके सहारे मध्यकालीन समाज की तमाम गैर-बराबरियां इस नवीन व्यवस्था में ठाठ से घुसी चली आती हैं। पहले यह सामाजिक वफादारियों को राज्य के प्रति वफादारी में बदलने के लिए स्थापित गैर-बराबरीपूर्ण व्यवस्थाओं का अपने फायदे में भरपूर इस्तेमाल करता है और इसीलिए बाद में उन्हें कभी नकार नहीं पाता। जाति जैसे सवाल इसमें प्रमुख हैं। नेहरूवियन आधुनिकता में मौजूद यह फांक ही जाति व्यवस्था को कहीं गहरे पुन:स्थापित करती है। पान सिंह की उम्मीद राज्य रूपी संस्था और उसके द्वारा किये आधुनिकता के वादे से सदा बनी रहती है। वह खुद बंदूक उठाता है लेकिन अपने बेटे को कभी उस रास्ते पर नहीं आने देता। वह दिल से चाहता है कि राज्य का यह आधुनिक सपना जिये। लेकिन राज्य उसके सामने कोई और विकल्प नहीं छोड़ता।
यह ऐतिहासिक रूप से भी सच्चाई के करीब है। अगर आप फिल्म में देखें, तो यह अस्सी के दशक तक कहानी का वो हिस्सा सुनाती है, जिसमें अगड़ी जाति के लोग जमीन पर कब्जे के लिए लड़ रहे हैं और राज्य संस्था इसे पारिवारिक अदावत घोषित कर इसे सुलझाने से अपने हाथ खींच लेती है। दरअसल आधुनिक राज्य संस्था ने स्थानीय स्तर पर उन सामंती शक्तियों से समझौता कर लिया था, जिनके खिलाफ उसे लड़ना चाहिए था। यह नवस्वतंत्र मुल्क में शासन स्थापित करने और अपनी वैधता स्थापित करने का एक आसान रास्ता था। ऐसे में जरूरत पड़ने पर भी वह उनकी गैरबराबरियों के खिलाफ कभी बोली नहीं। बंदूक उठाने वाले यहीं से पैदा होते हैं। वे आधुनिक राज्य द्वारा किये उन वादों के भग्नावशेषों पर खड़े हैं, जिनमें समता और समानता की स्थापना और समाज से तमाम गैर-बराबर पुरातन व्यवस्थाओं को खदेड़ दिये जाने की बातें थीं।

जय अर्जुन सिंह फिल्म पर अपने आलेख में इस बात का उल्लेख करते हैं कि फिल्म के अंत में आया नर्गिस की मौत की खबर वाला संदर्भ इसे कल्ट फिल्म ‘मदर इंडिया’ से जोड़ता है और यह उन नेहरूवियन आदर्शों की मौत है, जिनकी प्रतिनिधि फिल्म हिंदी सिनेमा इतिहास में ‘मदर इंडिया’ है। मुझे यहां उन्नीस सौ सड़सठ में आयी मनोज कुमार की ‘उपकार’ याद आती है। एक सेना का जवान जो किसान भी है, ठीक पान सिंह की तरह, और जिसकी सामुदायिक वफादारियां इस आधुनिक राष्ट्र राज्य के मिलावटी विचार के साथ एकाकार हो जाती हैं। तिग्मांशु धूलिया की ‘पान सिंह तोमर’ इस आदर्श राज्य व्यवस्था की स्थापना वाली भौड़ी ‘उपकार’ की पर्फेक्ट एंटी-थिसिस है। यहां भी एक सेना का जवान है, जो मूलत: किसान है, लेकिन आधुनिकता का महास्वप्न अब एक छलावा भर है। इस जवान-किसान की भी वफादारी में कोई कमी नहीं, उसने देश के लिए सोने के तमगे जीते हैं। लेकिन देखिए, वह पूछने पर मजबूर हो जाता है कि, “देश के लिए फालतू भागे हम?” अंत में वह व्यवस्था द्वारा बहिष्कृत समाज के हाशिये पर खड़ा है और उसके हाथ में बंदूक थमा दी गयी है। वह जवाब मांग रहा है कि उसके हाथ में थमायी गयी इस बंदूक के लिए जिम्मेदार कौन है, और कौन उन्हें सजा देगा?
गौर करने की बात है कि ‘पान सिंह तोमर’ में मारे जाने वाले गूर्जर हैं, जिनका स्थान सामाजिक पदक्रम में अगड़ी जातियों से नीचे आता है। और यह तीस-पैंतीस साल पुरानी बात है। आज यही गूर्जर राजस्थान में अपने हक की जायज-नाजायज मांग करते निरंतर आंदोलनरत हैं। और इस जाति व्यवस्था के आधुनिकता के बीच भी काम करने का सबसे अच्छा उदाहरण खुद फिल्म में ही देखा जा सकता है। वहां देखिए जहां इंस्पेक्टर (सदा सर्वोत्कृष्ट जाकिर हुसैन) गोपी के ससुराल मिलने आये हैं। यह सामाजिक पदक्रम में नीचे खड़ा परिवार है। पुलिसिया थानेदार का उद्देश्य पान सिंह तोमर के गिरोह की टोह लेना है और वह कहते हैं, “जात पात कछू न होत कक्का। इंसान-इंसान के काम आनो चहिए। और जिसके हाथ के खाए हुवे थे धरम भरष्ट हो जावे, ऐसे धरम को तो भरष्ट ही हो जानो चहिए।” वे पानी पीने को भी मंगाते हैं। गौर कीजिए कि तमाम सूचनाएं निकलवा लेने के बाद किस चालाकी से वह बिना उनके घर का पानी पिये ही निकल जाते हैं। यही दोहरे मुखौटे वाला आधुनिक भारतीय राज्य का असल चेहरा है।
जिला टोंक अपने देश में कहां है, ठीक-ठीक जानने के लिए शायद आप में से बहुत को आज भी नक्शे की जरूरत पड़े। और क्योंकि मैं उन्हीं के गृह जिले से आता हूं, इसलिए अच्छी तरह जानता हूं कि चंबल की ही एक सहायक नदी ‘बनास’ के सहारे बसा होने के बावजूद टोंक की स्थानीय बोली बीहड़ की भाषा से कितनी अलग है। और इसीलिए इरफान ने जिस खूबी से उस लहजे को अपनाया है, मेरे मन में उनके भीतर के कलाकार की इज्जत और बढ़ गयी है। जिस तरह वे पर्लियामेंट, मिलिट्री, स्पोर्ट्स जैसे खास शब्दों के उच्चारण में एकदम माफिक अक्षर पर विराम लेते हैं और ठीक जगह पर बलाघात देते हैं, भरतपुर-भिंड-मुरैना-ग्वालियर की समूची चंबल बैल्ट जैसे परदे पर जी उठती है। वे दौड़ते हैं और उनका दौड़ना घटना न रहकर जल्द ही किसी बिंब में बदल जाता है। बीहड़ में विपक्षी को पकड़ने के लिए भागते हुए जंगल में सामने आयी बाधा कैसे स्टीपलचेज धावक को उसका मासूम लड़कपन याद दिलाती है, देखिए।
इन तमाम विमर्श से अलग ‘पान सिंह तोमर’ कविता की हद को छूने वाली फिल्म है। पहली बार मैं सुनता हूं जब कोच सर कहते हैं, “ओये तू पाणी पर दौड़ेगा।” और समझ खुश होता हूं कि यह स्टीपलचेज जैसी दौड़ के लिए एक सुंदर मुहावरा है। लेकिन दूसरी बार सिनेमाहाल में फिल्म देखते हुए अचानक समझ आता है कि इस वाक्य के कितने गहरे निहितार्थ हैं। यह संवाद पान सिंह तोमर की पूरी जिंदगी की कहानी है। जिंदगी भर वो बीहड़ में चंबल के पानी पर ही तो दौड़ता रहा। संदीप चौटा का पार्श्वसंगीत फिल्म को विहंगम भाव प्रदान करता है और बेदाग सिनेमैटोग्राफी महाकाव्य सी ऊंचाई। तिग्मांशु की अन्य फिल्मों की तरह ही यहां भी संवाद फिल्म की जान हैं, लेकिन सबसे विस्मयकारी वे दृश्य हैं, जहां इरफान बिना किसी संवाद वो कह देते हैं, जिसे शब्दों में कहना संभव नहीं। मेरा पसंदीदा दृश्य फिल्म के बाद के हिस्से में आया वो शॉट है, जहां सेना के कंटोनमेंट एरिया में अपने जवान हो चुके बेटे से मिलने आये अधेड़ पान सिंह पीछे से अपने वर्दी पहने बेटे को जाता हुआ देख रहे हैं। आप सिर्फ उन आंखों को देखने भर के लिए यह फिल्म देखने जाएं। ऐसा विस्मयकारी दृश्य लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के लिए दुर्लभ है।
‘पान सिंह तोमर’ जैसी फिल्में हिंदी सिनेमा में दुर्लभ हैं और मुश्किल से नसीब होती हैं। हम इस राष्ट्र की किसी एक उपकथा के माध्यम से इस बिखरी तस्वीर के सिरे आपस में जोड़ पाते हैं। ‘पान सिंह तोमर’ वह उपकथा है, जिसमें आधुनिक राज्य अपना किया वादा पूरा नहीं करता और निर्णायक क्षण में अपने हाथ वापस खींच लेता है। एक सामान्य नागरिक बंदूक उठाने के लिए इसलिए मजबूर होता है क्योंकि उसके लिए दो ही विकल्प छोड़े गये हैं, पहला कि बंदूक उठाओ या फिर दूसरा कि मारे जाओ। मरना दोनों विकल्पों में बदा है। वर्तमान में इसी राज्य द्वारा पोषित कथित ‘विकास’ के अश्वमेधी घोड़े के रथचक्र में पिस रहे असहाय नागरिक द्वारा विरोध में उठाये जाते विद्रोह के झंडे को भी इसी संदर्भ में पढ़ने की कोशिश करें। देखें कि आखिर उसके लिए हमारी राज्य व्यवस्था ने कौन से विकल्प छोड़े हैं? और यह भी कि अगर निर्वाह के लिए वही विकल्प आपके या मेरे सामने होते तो हमारा चयन क्या होता?
(मिहिर पंड्या। दिल्ली विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो। हिंदी सिनेमा में शहर दिल्ली की बदलती संरचना पर एमफिल। आवारा हूं नाम से मशहूर ब्लॉग। कथादेश के नियमित स्तंभकार। उनसे miyaamihir@gmail.com पर संपर्क करें।
“हम तो एथलीट हते, धावक। इंटरनेशनल। अरे हमसे ऐसी का गलती है गयी, का गलती है गयी कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ। और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी। अब हम भग रए चंबल का बीहड़ में। जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को दैगो?”
…‘पान सिंह तोमर’ अपने दद्दा से जवाब मांग रहा है। इरफान खान की गुरु-गंभीर आवाज पूरे सिनेमा हाल में गूंज रही है। मैं उनकी बोलती आंखें पढ़ने की कोशिश करता हूं। लेकिन मुझे उनमें बदला नहीं दिखाई देता। नहीं, ‘बदला’ इस कहानी का मूल कथ्य नहीं। पीछे से उसकी टोली के और जवान आते हैं और अचानक विपक्षी सेनानायक की जीवनलीला समाप्त कर दी जाती है। पान सिंह को झटका लगता है। वो बुलंद आवाज में चीख रहा है, “हमारो जवाब पूरो न भयो।”
अचानक सिनेमा हाल की सार्वजनिकता गायब हो जाती है और पान सिंह की यह पुकार सीधे किसी फ्लैश की तरह आंखों के पोरों में आ गड़ती है। हां, इस कथा में ‘दद्दा’ मुख्य विलेन नहीं, गौण किरदार हैं। दरअसल यह कथा सीधे बीहड़ के किसान पान सिंह तोमर की भी नहीं, वह तो इस कथा को कहने का इंसानी जरिया बने हैं। यह कथा है उस महान संस्था की जिसके ‘संगे-संगे’ पान सिंह तोमर की कहानी शुरू होती है और अगले पैंतीस साल किसी समांतर कथा सी चलती है। भारतीय राज्य, नेहरूवियन आधुनिकता को धारण करने वाली वो एजेंसी जिसके सहारे आधुनिकता का यह वादा समुदायगत पहचानों को सर्वोपरि रखने वाले हिंदुस्तानी नागरिक के जीवन-जगत में पहुंचाया गया, यह उसके द्वारा दिखाये गये ध्वस्त सपनों की कथा है। उन मृगतृष्णाओं की कथा, जिनके भुलावे में आकर पान सिंह तोमर का, सफलताओं की गाथा बना शुरुआती जीवन हमेशा के लिए पल्टी खा जाता है।
यह अस्सी के दशक की शुरुआत है। गौर कीजिए, स्थानीय पत्रकार (सदा मुख्य सूचियों से बाहर रहे, गजब के अभिनेता ब्रिजेंद्र काला) पूछता है सूबेदार से, डकैत बने पान सिंह से, “बंदूक आपने पहली बार कब उठायी?” और पान सिंह का जवाब है, “अंगरेज भगे इस मुल्क से। बस उसके बाद। पंडित जी परधानमंत्री बन गये, और नवभारत के निर्माण के संगे-संगे हमओ भी निर्माण शुउ भओ।” गौर कीजिए, अपने पहले ही संवाद में पान सिंह इस आधुनिकता के पितामह का न सिर्फ नाम लेता है, उनके दिखाये स्वप्न ‘नवभारत’ के साथ अपनी गहरी समानता भी स्थापित करता है।
पश्चिमी आधुनिकता की नकल पर तैयार किया खास भारतीय आधुनिकता का मॉडल, जिसमें मिलावटी रसायन के तौर पर यहां की सामंती व्यवस्था चली आती है। यह अर्ध सामंती – अर्ध पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य संस्था की कथा है, जिसकी बदलती तस्वीर ‘पान सिंह तोमर’ में हर चरण पर नजर आती है। मुख्य नायक खुद पान सिंह तोमर इसी पुरानी सामंती व्यवस्था से निकलकर आया है और आप उसके शुरुआती संवादों में समुदायगत पहचानों के लिए वफादारियां साफ पढ़ सकते हैं। अफसर द्वारा पूछे जाने पर कि क्या देश के लिए जान दे सकते हो, उसका जवाब है, “हां साब, ले भी सकते हैं। देस-जमीन तो हमारी मां होती है। मां पे कोई उंगली उठाये तो का फिर चुप बैठेंगे?” और यहीं उसके जवाबों में आप नवस्वतंत्र देश के नागरिकों की उन शुरुआती उलझनों को भी पढ़ सकते हैं, जो राज्य संस्था, उसके अधिकार क्षेत्र और उसकी भूमिका को ठीक से समझ पाने में अभी तक परेशानी महसूस कर रहे थे। पूछा जाता है पान सिंह से कि क्या वो सरकार में विश्वास रखता है, और उसका दो टूक जवाब है, “ना साब। सरकार तो चोर है। जेई वास्ते तो हम सरकार की नौकरी न कर फौज की नौकरी में आये हैं।”
स्पष्ट है कि पान सिंह के लिए राज्य द्वारा स्थापित किये जा रहे आधुनिकता के इस विचार की आहट नयी है। लेकिन यह विचार सुहावना भी है। अपने समय और समाज के किसी प्रतिनिधि उदाहरण की तरह वो जल्द ही इसकी गिरफ्त में आ जाता है। और इसी वजह से आप उसके विचारों और समझदारी में परिवर्तन देखते हैं। यह पान सिंह का सफर है, “हमारे यहां गाली के जवाब में गोली चल जाती है कोच सरजी” से शुरू होकर यह उस मुकाम तक जाता है, जहां गांव में विपक्ष से लेकर अपने पक्ष वाले भी उसका बंदूक न उठाने और बार-बार कार्यवाही के लिए पुलिस के पास भागे चले जाने का मजाक उड़ा रहे हैं। अपने-आप में यह पूरा बदलाव युगांतकारी है। और फिल्म के इस मुकाम तक यह उस नागरिक की कथा है, जो आया तो हिंदुस्तान के देहात की पुरातन सामंती व्यवस्था से निकलकर है, लेकिन जिसको आधुनिकता के विचार ने अपने मोहपाश में बांध लिया है। जिसका आधुनिक ‘राज्य’ की संस्था द्वारा अपने नागरिक से किये वादे में यकीन है। वह उससे उम्मीद करता है और व्यवस्था की स्थापना का हक सिर्फ उसे देता है।
विचारक आशीष नंदी भारतीय राष्ट्र-राज्य संस्था पर बात करते हुए लिखते हैं, “स्वाधीनता के पश्चात उभरे अभिजात्य वर्ग की राज्य संबंधी अवधारणा राजनीतिक रूप से ‘विकसित’ समाजों में प्रचलित अवधारणा से उधार ली गयी थी। चूंकि हमारा अभिजात्य वर्ग राज्य के इस विचार में निहित समस्याओं से अनभिज्ञ नहीं था, इसलिए उसने भारत की तथाकथित अभागी और आदम विविधताओं के साथ समझौता करके थोड़ा मिलावटी विचार विकसित किया।” यही वो मिलावटी विचार है, जहां आधुनिकता के संध्याकाल में वही पुराना सामंती ढांचा फिर से सर उठाता है और ठीक यहीं किसी गठबंधन के तहत राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है।
इसीलिए, फिल्म में सबसे निर्णायक क्षण वो है, जहां पान सिंह के बुलावे पर गांव आया कलेक्टर यह कहकर वापस लौट जाता है, “देखो, ये है चंबल का खून। अपने आप निपटो।” यह आधुनिकता द्वारा दिखाये उस सपने की मौत है, जिसके सहारे नवस्वतंत्र देश के नागरिक पुरातन व्यवस्था की गैर-बराबरियों के चंगुल से निकल जाने का मार्ग तलाश रहे थे। फिर आप राज्य की एक दूसरी महत्वपूर्ण संस्था ‘पुलिस’ को भी ठीक इसी तरह पीछे हटता पाते हैं। यहीं हिंदुस्तानी राष्ट्र-राज्य संस्था और उसके द्वारा निर्मित खास आधुनिकता के मॉडल का वो पेंच खुल कर सामने आता है, जिसके सहारे मध्यकालीन समाज की तमाम गैर-बराबरियां इस नवीन व्यवस्था में ठाठ से घुसी चली आती हैं। पहले यह सामाजिक वफादारियों को राज्य के प्रति वफादारी में बदलने के लिए स्थापित गैर-बराबरीपूर्ण व्यवस्थाओं का अपने फायदे में भरपूर इस्तेमाल करता है और इसीलिए बाद में उन्हें कभी नकार नहीं पाता। जाति जैसे सवाल इसमें प्रमुख हैं। नेहरूवियन आधुनिकता में मौजूद यह फांक ही जाति व्यवस्था को कहीं गहरे पुन:स्थापित करती है। पान सिंह की उम्मीद राज्य रूपी संस्था और उसके द्वारा किये आधुनिकता के वादे से सदा बनी रहती है। वह खुद बंदूक उठाता है लेकिन अपने बेटे को कभी उस रास्ते पर नहीं आने देता। वह दिल से चाहता है कि राज्य का यह आधुनिक सपना जिये। लेकिन राज्य उसके सामने कोई और विकल्प नहीं छोड़ता।
यह ऐतिहासिक रूप से भी सच्चाई के करीब है। अगर आप फिल्म में देखें, तो यह अस्सी के दशक तक कहानी का वो हिस्सा सुनाती है, जिसमें अगड़ी जाति के लोग जमीन पर कब्जे के लिए लड़ रहे हैं और राज्य संस्था इसे पारिवारिक अदावत घोषित कर इसे सुलझाने से अपने हाथ खींच लेती है। दरअसल आधुनिक राज्य संस्था ने स्थानीय स्तर पर उन सामंती शक्तियों से समझौता कर लिया था, जिनके खिलाफ उसे लड़ना चाहिए था। यह नवस्वतंत्र मुल्क में शासन स्थापित करने और अपनी वैधता स्थापित करने का एक आसान रास्ता था। ऐसे में जरूरत पड़ने पर भी वह उनकी गैरबराबरियों के खिलाफ कभी बोली नहीं। बंदूक उठाने वाले यहीं से पैदा होते हैं। वे आधुनिक राज्य द्वारा किये उन वादों के भग्नावशेषों पर खड़े हैं, जिनमें समता और समानता की स्थापना और समाज से तमाम गैर-बराबर पुरातन व्यवस्थाओं को खदेड़ दिये जाने की बातें थीं।

जय अर्जुन सिंह फिल्म पर अपने आलेख में इस बात का उल्लेख करते हैं कि फिल्म के अंत में आया नर्गिस की मौत की खबर वाला संदर्भ इसे कल्ट फिल्म ‘मदर इंडिया’ से जोड़ता है और यह उन नेहरूवियन आदर्शों की मौत है, जिनकी प्रतिनिधि फिल्म हिंदी सिनेमा इतिहास में ‘मदर इंडिया’ है। मुझे यहां उन्नीस सौ सड़सठ में आयी मनोज कुमार की ‘उपकार’ याद आती है। एक सेना का जवान जो किसान भी है, ठीक पान सिंह की तरह, और जिसकी सामुदायिक वफादारियां इस आधुनिक राष्ट्र राज्य के मिलावटी विचार के साथ एकाकार हो जाती हैं। तिग्मांशु धूलिया की ‘पान सिंह तोमर’ इस आदर्श राज्य व्यवस्था की स्थापना वाली भौड़ी ‘उपकार’ की पर्फेक्ट एंटी-थिसिस है। यहां भी एक सेना का जवान है, जो मूलत: किसान है, लेकिन आधुनिकता का महास्वप्न अब एक छलावा भर है। इस जवान-किसान की भी वफादारी में कोई कमी नहीं, उसने देश के लिए सोने के तमगे जीते हैं। लेकिन देखिए, वह पूछने पर मजबूर हो जाता है कि, “देश के लिए फालतू भागे हम?” अंत में वह व्यवस्था द्वारा बहिष्कृत समाज के हाशिये पर खड़ा है और उसके हाथ में बंदूक थमा दी गयी है। वह जवाब मांग रहा है कि उसके हाथ में थमायी गयी इस बंदूक के लिए जिम्मेदार कौन है, और कौन उन्हें सजा देगा?
गौर करने की बात है कि ‘पान सिंह तोमर’ में मारे जाने वाले गूर्जर हैं, जिनका स्थान सामाजिक पदक्रम में अगड़ी जातियों से नीचे आता है। और यह तीस-पैंतीस साल पुरानी बात है। आज यही गूर्जर राजस्थान में अपने हक की जायज-नाजायज मांग करते निरंतर आंदोलनरत हैं। और इस जाति व्यवस्था के आधुनिकता के बीच भी काम करने का सबसे अच्छा उदाहरण खुद फिल्म में ही देखा जा सकता है। वहां देखिए जहां इंस्पेक्टर (सदा सर्वोत्कृष्ट जाकिर हुसैन) गोपी के ससुराल मिलने आये हैं। यह सामाजिक पदक्रम में नीचे खड़ा परिवार है। पुलिसिया थानेदार का उद्देश्य पान सिंह तोमर के गिरोह की टोह लेना है और वह कहते हैं, “जात पात कछू न होत कक्का। इंसान-इंसान के काम आनो चहिए। और जिसके हाथ के खाए हुवे थे धरम भरष्ट हो जावे, ऐसे धरम को तो भरष्ट ही हो जानो चहिए।” वे पानी पीने को भी मंगाते हैं। गौर कीजिए कि तमाम सूचनाएं निकलवा लेने के बाद किस चालाकी से वह बिना उनके घर का पानी पिये ही निकल जाते हैं। यही दोहरे मुखौटे वाला आधुनिक भारतीय राज्य का असल चेहरा है।
जिला टोंक अपने देश में कहां है, ठीक-ठीक जानने के लिए शायद आप में से बहुत को आज भी नक्शे की जरूरत पड़े। और क्योंकि मैं उन्हीं के गृह जिले से आता हूं, इसलिए अच्छी तरह जानता हूं कि चंबल की ही एक सहायक नदी ‘बनास’ के सहारे बसा होने के बावजूद टोंक की स्थानीय बोली बीहड़ की भाषा से कितनी अलग है। और इसीलिए इरफान ने जिस खूबी से उस लहजे को अपनाया है, मेरे मन में उनके भीतर के कलाकार की इज्जत और बढ़ गयी है। जिस तरह वे पर्लियामेंट, मिलिट्री, स्पोर्ट्स जैसे खास शब्दों के उच्चारण में एकदम माफिक अक्षर पर विराम लेते हैं और ठीक जगह पर बलाघात देते हैं, भरतपुर-भिंड-मुरैना-ग्वालियर की समूची चंबल बैल्ट जैसे परदे पर जी उठती है। वे दौड़ते हैं और उनका दौड़ना घटना न रहकर जल्द ही किसी बिंब में बदल जाता है। बीहड़ में विपक्षी को पकड़ने के लिए भागते हुए जंगल में सामने आयी बाधा कैसे स्टीपलचेज धावक को उसका मासूम लड़कपन याद दिलाती है, देखिए।
इन तमाम विमर्श से अलग ‘पान सिंह तोमर’ कविता की हद को छूने वाली फिल्म है। पहली बार मैं सुनता हूं जब कोच सर कहते हैं, “ओये तू पाणी पर दौड़ेगा।” और समझ खुश होता हूं कि यह स्टीपलचेज जैसी दौड़ के लिए एक सुंदर मुहावरा है। लेकिन दूसरी बार सिनेमाहाल में फिल्म देखते हुए अचानक समझ आता है कि इस वाक्य के कितने गहरे निहितार्थ हैं। यह संवाद पान सिंह तोमर की पूरी जिंदगी की कहानी है। जिंदगी भर वो बीहड़ में चंबल के पानी पर ही तो दौड़ता रहा। संदीप चौटा का पार्श्वसंगीत फिल्म को विहंगम भाव प्रदान करता है और बेदाग सिनेमैटोग्राफी महाकाव्य सी ऊंचाई। तिग्मांशु की अन्य फिल्मों की तरह ही यहां भी संवाद फिल्म की जान हैं, लेकिन सबसे विस्मयकारी वे दृश्य हैं, जहां इरफान बिना किसी संवाद वो कह देते हैं, जिसे शब्दों में कहना संभव नहीं। मेरा पसंदीदा दृश्य फिल्म के बाद के हिस्से में आया वो शॉट है, जहां सेना के कंटोनमेंट एरिया में अपने जवान हो चुके बेटे से मिलने आये अधेड़ पान सिंह पीछे से अपने वर्दी पहने बेटे को जाता हुआ देख रहे हैं। आप सिर्फ उन आंखों को देखने भर के लिए यह फिल्म देखने जाएं। ऐसा विस्मयकारी दृश्य लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के लिए दुर्लभ है।
‘पान सिंह तोमर’ जैसी फिल्में हिंदी सिनेमा में दुर्लभ हैं और मुश्किल से नसीब होती हैं। हम इस राष्ट्र की किसी एक उपकथा के माध्यम से इस बिखरी तस्वीर के सिरे आपस में जोड़ पाते हैं। ‘पान सिंह तोमर’ वह उपकथा है, जिसमें आधुनिक राज्य अपना किया वादा पूरा नहीं करता और निर्णायक क्षण में अपने हाथ वापस खींच लेता है। एक सामान्य नागरिक बंदूक उठाने के लिए इसलिए मजबूर होता है क्योंकि उसके लिए दो ही विकल्प छोड़े गये हैं, पहला कि बंदूक उठाओ या फिर दूसरा कि मारे जाओ। मरना दोनों विकल्पों में बदा है। वर्तमान में इसी राज्य द्वारा पोषित कथित ‘विकास’ के अश्वमेधी घोड़े के रथचक्र में पिस रहे असहाय नागरिक द्वारा विरोध में उठाये जाते विद्रोह के झंडे को भी इसी संदर्भ में पढ़ने की कोशिश करें। देखें कि आखिर उसके लिए हमारी राज्य व्यवस्था ने कौन से विकल्प छोड़े हैं? और यह भी कि अगर निर्वाह के लिए वही विकल्प आपके या मेरे सामने होते तो हमारा चयन क्या होता?
(मिहिर पंड्या। दिल्ली विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो। हिंदी सिनेमा में शहर दिल्ली की बदलती संरचना पर एमफिल। आवारा हूं नाम से मशहूर ब्लॉग। कथादेश के नियमित स्तंभकार। उनसे miyaamihir@gmail.com पर संपर्क करें।प्रिय मिहिर,
छोटी उम्र में सिनेमा के बारे में उत्कृष्ट विश्लेषनात्मक समझ आपने विकसित की, मैं इसे एक उपलब्धि मानता हूँ. इन दिनों पान सिंह तोमर के बारे में समाचार माध्यमों में जितनी भी समीक्षायें अथवा मूल्यांकन प्रकाशित हुए हैं -चाहे वे अंग्रेजी भाषा में हों या हिंदी में (क्योंकि मुझे इन्हीं दो भाषाओँ में पढ़ने को मिलता है), वे मैंने पढ़े हैं. आपका मूल्यांकन, न कि समीक्षा, इनमें से सर्व श्रेष्ठ है. इसलिये कि इसमें बहुत बारीकी से झाँकने से जिन घटनाओं को शासन और राज्य के सन्दर्भों के आइने में प्रस्तुत किया गया है अन्य में न वैसी दृष्टि रही और न वे ऐसे सन्दर्भों को मूल्यांकन से जोड़ पाये जैसा कि आपने लिख दिखाया है. नेहरूवियन काल की सत्ता में राज्य के संसाधनों को जिस प्रकार से चन्द मुठ्ठी भर लोगों ने अनंत काल तक सामंती विरासत के प्रभावों के अंतर्गत समेट लिया और चिरकाल के लिये उन्हें अपने हितों के लिये इस्तेमाल करते रहने की व्यवस्था को एक साजिश जैसी योजना के तहत स्थाई कर लेने की प्रवृति विकसित होने दी वह भारत में प्रजातंत्र के नाम पर एक सड़ी हुई व्यवस्था को ही हमारे सामने लाई. पान सिंह तोमर जैसे वीर, सशक्त और सच्चे भारतीय किसान-सैनिक की परिणति के लिये यही व्यवस्था और सड़ी सोच वाले लोगों द्वारा चलायी जाने वाली व्यस्थामूलक बुराई उत्तरदाई है. जिन पुलिसिओं की 'वीरता' और ब्यूरोक्रेटिक गुलामी ने पान सिंह जैसों को बागी घोषित करके गोलिओं से भून दिया और इनाम पाये उन्हें डूब मरने के लिये इस देश की नदियों और ताल-तलय्यों में पानी नहीं मिलना चाहिये था. आपका विश्लेषण झकझोरने वाला है और आधुनिक तंत्र के ढकोसले पर पर्याप्त रोशनी डालते हुए इस पर तीव्र प्रहार करने के लिये उद्वेलित करता है.
Siddhpur
Enchanting Mansions of Siddhpur
(Gujarat)
Sunday, 4 March 2012
CENTURY OLD MEMORIAL CHHATRIS IN ASTHAL BOHAR MUTT DEMOLISHED
Believe it or not but the fact is that several monuments and cenotaphs erected from 1780 to 1910 AD in the memory of renowned Nath Sadhus of yore and majestically standing since then on the sprawling old mound in the campus of Asthal Bohar monastery have been demolished to make way for a fabulous new building on the line of Akshardham of Delhi. ‘It has totally altered the majestic skyline of the monastery and is shocking for the conservators of art and cultural heritage of the State’ said Ranbir Phaugat , a cultural historian and also President of Society for People’s Advancement, Technology & Heritage and also life member of Indian National Trust for Art & Cultural Heritage. He added that Mahant Chand Nath had also previously got the ‘Chitrashala Bhawan’ demolished sometime in the mid-nineteen eighties that was also built to represent through frescoes the cultural life of the people of erstwhile Punjab and episodes from the life of renowned Nath Sadhus. Amongst the demolished memorials is a brick canopy over the Dhoona of Siddh Baba Chaurangi Nath, popularly known as Pooran Mull – the eldest son of Raja Saliwahan of Sialkot and elder brother of Raja Risalu about whom several legends were traditionally sung by the Jogis and Sangees of Punjab. The legend as sung by the Jogis was documented by Capt. R.C.Temple in the early nineteen hundred eighties of the Era. The brick canopy was built with large sized tiles in the twelfth century and engulfed inside the magnificent memorial building raised later over the Smadh of Siddh Baba Mast Nath. The other memorials that were recently demolished belonged to Siddh Baba Total Nath- successor to Baba Mast Nath, joint cenotaphs of Baba Megh Nath-Mohar Nath-Chet Nath and Pooran Nath. Due to the demolition of the buildings that provided cover, the grave built in lakhauri bricks at the time of actual burials of the Babas have been exposed. At the time of the recently held fair at the campus in reverence to Baba Mast Nath, the public felt shocked and anguished to find the chhatris demolished.
‘The current Mahant has done irretrievable loss to the built heritage of at Asthal Bohar Mutt campus in which act the frescoes in the rooftop chhatri of Baba Tota Nath, as last vestiges of the art heritage, were lost forever’, lamented Mr. Singh. He added that the memorials were demolished with silent support from certain influential politicians including a scion from the erstwhile ruling family of Alwar in addition to a well known religious and social personality as could be evidenced from the inscription stone installed at site at the time of Bhoomi Poojan. Not a single voice in protest was either raised or reported in the media against this silently completed operation.
The entire population of over 1.5 lakhs of the group of eight villages comprising Bohar, Baliana, Pahrawar, Kheri Sadh, Bhalaut, Garhi, Majra and Pakasma that have traditionally provided material support to the Mutt should have decried the act of demolition and wastage of huge sums of money needed to built a huge decorative building at the same site replacing old monuments, observed other people such as Prof. Manmohan Kumar, renowned historian in the Department of History and Archaeology, Maharshi Dayanand University, Rohtak to whom Mr Singh had spoken. Dr. Kumar also expressed helplessness and said that the the Mahant never asked historians and conservationists about their opinion. The State department of archaeology seems to have forgotten its act of preserving the Chhatris, which were more than a hundred years old and covered under the Preservations of Ancient Sites and Monuments Act-1956 of Govt. of India. ‘Even the British could not have thought of demolishing the fine monuments had we been under their rule’ said Mr Singh and observed ‘that the trend indicates neglect of heritage properties in Haryana due to which a large number of monuments or buildings of heritage significance have been ruined’.
Incidentally, it may be mentioned that Mr. Singh pioneered the documentation of tangible heritage of Haryana State and first time in 2008 scientifically listed the heritage value properties of district Rohtak.
‘The current Mahant has done irretrievable loss to the built heritage of at Asthal Bohar Mutt campus in which act the frescoes in the rooftop chhatri of Baba Tota Nath, as last vestiges of the art heritage, were lost forever’, lamented Mr. Singh. He added that the memorials were demolished with silent support from certain influential politicians including a scion from the erstwhile ruling family of Alwar in addition to a well known religious and social personality as could be evidenced from the inscription stone installed at site at the time of Bhoomi Poojan. Not a single voice in protest was either raised or reported in the media against this silently completed operation.
The entire population of over 1.5 lakhs of the group of eight villages comprising Bohar, Baliana, Pahrawar, Kheri Sadh, Bhalaut, Garhi, Majra and Pakasma that have traditionally provided material support to the Mutt should have decried the act of demolition and wastage of huge sums of money needed to built a huge decorative building at the same site replacing old monuments, observed other people such as Prof. Manmohan Kumar, renowned historian in the Department of History and Archaeology, Maharshi Dayanand University, Rohtak to whom Mr Singh had spoken. Dr. Kumar also expressed helplessness and said that the the Mahant never asked historians and conservationists about their opinion. The State department of archaeology seems to have forgotten its act of preserving the Chhatris, which were more than a hundred years old and covered under the Preservations of Ancient Sites and Monuments Act-1956 of Govt. of India. ‘Even the British could not have thought of demolishing the fine monuments had we been under their rule’ said Mr Singh and observed ‘that the trend indicates neglect of heritage properties in Haryana due to which a large number of monuments or buildings of heritage significance have been ruined’.
Incidentally, it may be mentioned that Mr. Singh pioneered the documentation of tangible heritage of Haryana State and first time in 2008 scientifically listed the heritage value properties of district Rohtak.
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Asthal Bohar
Thursday, 1 March 2012
तकनीक की हार से सिद्ध हुई परंपरा की मजबूती
Technology failure in the face of time tested tradition of
knot as device and rope making at Bangalore accident
टायम्स आफ इंडिया के किसी हालिया अंक में छपी खबर कि -'Woman falls to death as rope snaps during drill' अर्थात 'रस्सी अचानक टूटने से उसके सहारे नीचे उतर रही महिला गिर कर मरी' पढ़ते ही मेरा ध्यान अपनी हस्त कलाओं की ओर गया. मुझे विश्वास है कि जिस रस्सी का उपयोग महिला ने किया था वह ज़रूर बाज़ार से लायी गयी होगी ओर उसे मशीन से बुना गया होगा. मशीन से बुनी हुई रस्सी और हाथ से वटी रस्सी में यही फर्क होता है कि हाथ वाली रस्सी एकदम से नहीं टूटती बल्कि घिस कर टूटती है और टूटना शुरू होने पर भी इतना वक़्त ज़रूर देती है कि संभालने/संभलने का मौका मिले. यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो पता चलता है कि हाथ से वटी रस्सी में कदीमी तौर पर जूट के रेशे का उपयोग होता था. जूट तो हुआ अंग्रेज़ी नाम लेकिन हरियाणा में इसे सन और पटसन कहा जाता है. इसी रेशे को प्राप्त करने के लिये हमने अपने बुजुर्गों को इसकी फसल उगाते देखा है. हरियाणा में यह फसल असाढ़ी होती है अर्थात जुलाई /असाढ़ में बोई और अक्टूबर/आश्विन में काट कर किसी पोखर में दबा डी जाती है. दो महिना में इसके रेशे गल जाते हैं. फिर इनकी पूलिओं को पानी से बाहर निकल कर हवा में सूखने के लिये एक दूसरे के सहारे खड़ा कर दिया जाता है ताकि हवा इनके भीतर से निकले और वे जल्दी सूखें. तत्पश्चात, पौधे के पतले तने पर लिपटे हुए रेशे को हाथों से तोड़-तोड़ कर और खींच कर अलग किया जाता है. इस रेशे के पुंजों को लपेट कर गुच्छ बना लिये जाते हैं. इनसे ही पहले स्तर पर पतली रस्सी और फिर इन्हें लम्बाई के बल आपस में एक दूसरे के सामानांतर बल देते हुए लपेटने से रस्सी कि मोटाई को बढ़ाया जाता है जिस प्रक्रिया के चलते रस्सी कि मोटाई और लम्बाई तय होती है. हाथ से बल देने की प्रक्रिया में प्राकृतिक रेशे से तय्यार रस्सा भी बहुत मजबूत होता है. लेकिन यह मजबूती मशीन से वाटे गये रस्सी में कदापि नहीं आ सकती. इसलिये जहाँ जान का जोखिम हो या जान बचाने का कोई उपक्रम या अभ्यास किया जाना हो वहां पर हाथ से वाटे हुए रस्सों का प्रयोग करना उचित होता है. मशीनीकरण के बावलेपन में हमने न केवल एक परम्परा को खो दिया है बल्कि जानलेवा मूर्खताओं को भी न्योता दे दिया है.
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Technology vs tradition
Tuesday, 21 February 2012
हरियाणवी सिनेमा के बहाने कुछ चर्चा
Despite presence film making in Haryana not adequately evolved
हरियाणवी सिनेमा के बहाने कुछ चर्चा
हरियाणवी सिनेमा के बहाने कुछ चर्चा
(यह चर्चा दो व्यक्तिओं -रणबीर सिंह और सुशोभित शक्तावत के बीच नेट पर है संवाद के संपादित अंशों पर आधारित है. इसे केवल अकादमीय परिप्रेक्ष्य में समझना उचित होगा)
'सिनेमा को समझने के लिए महान फिल्में देखने से बेहतर कोई और रास्ता नहीं। दुनिया की क्लासिक फिल्मों, टॉप 100 फिल्मों वगैरह की सूचियां इंटरनेट पर मुहैया हैं। पुस्तकें भी इंटरनेट पर मिल जाएंगी। आइज़ेंस्ताइन से लेकर ब्रेसां और गोदार से लेकर फ़ेलिनी तक सिनेमा की कई सैद्धांतिकियां हैं। हमारे यहां सत्यजित राय, रित्विक घटक हैं। यह एक व्यापक विषय है और इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में अभी तक इस पर यथेष्ट काम नहीं हुआ'।-सुशोभित शक्तावत
मैं हरियाणा में रहता हूँ और हरियाणवी सिनेमा के इतिहास पर एक किताब लिखना चाहता हूँ. मैंने जब इस बारे में सम्बंधित लोगों से बातचीत की तो उन्होंने सहयोग नहीं किया और यह सोचा होगा कि इस आदमी का साथ देने के बजाये क्यों न खुद ही इस काम को स्वयं कर लिया जाये. वे सक्षम तो थे नहीं. उन्होंनें मुझसे आईडिया उधार तो लिया लेकिन तीन बरस बीत जाने के बाद भी कुछ कर नहीं पाये हैं. मुझे नहीं लगता की वे कुछ कर पाएँगे . हालाँकि मैं उन लोगों को किसी मायने में कमजोर मान कर नहीं चल रहा हूँ. आप तो जानते हैं की इस काम में गहरी प्रतिद्वंदिता है. विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता और जनसंचार एवं हिंदी विभागों में जो पी. एचडी. शोध करवाये जाते हैं उनमें से किसी गाईड को भी इस महत्वपूर्ण विधा के आलोचनात्मक इतिहास को कलमबद्ध करवाने का विचार अभी पनपा नहीं है.वैसे इस तरह के काम को प्रतिबद्धता से वही करेगा जो आप जैसी समझ के साथ कुछ-कुछ जनूनी भी होगा. मैने भारतीय सिनेमा के बारे में कुछ किताबें देखी तो हैं लेकिन वे आलोचनात्मक नहीं हैं- रणबीर सिंह
Writing a book on the History of Haryanvi Cinema (there are about 70 feature films so far in Haryani language.)-encompassing its genesis, growth and development is my wish. I envisaged this as necessity, for most of it is bad copy-work of Bollywood. Regrettably there is no Prakash Jha in Haryana. Recently one veteran actor Mr. Jagat Jakhar passed away. I don't know the reason that made him so ill that it turned out be fatal for him but probably it could be due to some sort of personally acquired problems. His colleagues have now vowed to release posthumously his last production -अनपढ़ जाट, that he could not accomplish during life time and independently and not able to manage a public release due to paucity of funds. The issue seems to have acquired a more emotional proportion than relating to art, cinema and communication.....and thereafter the sympathizers collectively impressed upon the administration of the State to make available adequate funds as grant for completing the unfinished task.
A 'film festival' or rather a gathering of film watchers on free is also annually held at Yamuna Nagar in which an academically sound and recognizable system of evaluation of cinema from Haryana or in the language of the State has failed to evolve despite a good presence of self-styled 'scholars' and 'critics' of cinema including a few film personalities associated in any way with Haryana! It is amazing that honest attempts for critical evaluation of the feature films and cinema as a medium of communication as well as its performance as growing industry of art in Haryana got scuttled due to parochial reasons most of which are non-academic such as bias for language, region, race and caste and ego. There should have been academic attempts by Universities in Haryana but there is complete silence on that front as most producers, financers, actors and script/story writers don't really prefer evaluation lest it may expose them to the tenets of review.
Haryanvi cinema grossly lacked acumen in story writing, script development, direction, skilled work in cinematography, screen-play, editing, copy-writing, costume and location selection, dialogue delivery, acting, music and what not. Most film were as good as caricatures of stories and characters or rather non-stories and did not last long in the memory of the people and critics, the least. I would say that there were no critics or author-writers that were properly qualified or knew about evaluation of a documentary and feature-film. Efforts are under way at Kurukshetra University to train interested people in film appreciation as the first course was completed in Feb. 2012. The course content, the academic status of the teachers/trainers could be known only after a time and only if a review or performance report is prepared by the authorities of the University.
I had seen Mughal-e-Ajam four-five times with the intention to find faults/lacunae/errors but there were none. On the other hand watching old 'classics' such as Naya Daur, Madhumati, Bees Saal Baad, Bandini, Baijoo Bawra, Kohinoor, Saheb Bibi aur Ghulam, Payasa, Kagaj kay Phool and a few more Guru Datt movies becomes a delightful experience. Guru Dutt's creations were superb in the sense that it moved one's emotions to higher degrees and one felt concerned and attached to the central character. Though Guru's moves dealt with deeper melancholia of humans and seemed to be dealing with a desire to be introvert but we knew, it depended what kind of association the movie-watchers could develop with the film characters and what type of impression a Guru Datt's movie was capable of leaving on the audience. (Irrespective of the fact that there could be a hundred type of audiences and scenarios). I don't think making money was the motive with Guru Datt rather it seemed that he was deeply anguished and wanted to express it through cinema in which Mr. V.K.Murthy, the Phalke award winner cinematographer helped him in doing some special effects that could be blended with human emotion, particularly the pathological one.- Ranbir Singh
I had seen Mughal-e-Ajam four-five times with the intention to find faults/lacunae/errors but there were none. On the other hand watching old 'classics' such as Naya Daur, Madhumati, Bees Saal Baad, Bandini, Baijoo Bawra, Kohinoor, Saheb Bibi aur Ghulam, Payasa, Kagaj kay Phool and a few more Guru Datt movies becomes a delightful experience. Guru Dutt's creations were superb in the sense that it moved one's emotions to higher degrees and one felt concerned and attached to the central character. Though Guru's moves dealt with deeper melancholia of humans and seemed to be dealing with a desire to be introvert but we knew, it depended what kind of association the movie-watchers could develop with the film characters and what type of impression a Guru Datt's movie was capable of leaving on the audience. (Irrespective of the fact that there could be a hundred type of audiences and scenarios). I don't think making money was the motive with Guru Datt rather it seemed that he was deeply anguished and wanted to express it through cinema in which Mr. V.K.Murthy, the Phalke award winner cinematographer helped him in doing some special effects that could be blended with human emotion, particularly the pathological one.- Ranbir Singh
"पश्चिम में विकसित सिनेमा यहाँ, अपने देश में, संचार के लिये एक सशक्त माध्यम इसलिए नहीं है, क्योंकि एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में हमारी सिनेमाई संवेदना नहीं है। ठीक वैसे ही, जैसे हमारी औपन्यासिक संवेदना नहीं है। पद्य और रंगमंच हमारे ज़्यादा क़रीब ठहरते हैं, बनिस्बत गद्य और सिनेमा के। सिनेमा गद्य है। सिनेमा एक टेक्स्ट है। विजुअल टेक्स्ट है। फ्रांस में न्यू वेव आंदोलन चला तो उन्होंने कहा कि निर्देशक सिनेमा का ऑथर होता है, लेखक होता है, इस आधार पर उन्होंने एक ऑत्योर थ्योरी बनाई। सिनेमा एक उत्तर आधुनिक प्रविधि के रूप में और अधिक उर्वरता प्राप्त कर रहा है और लिटररी थ्योरी के क्रिटिक्स उस पर बहुत अच्छा लिख रहे हैं।
दूसरे, सिनेमा समय में, काल में आधारित माध्यम है और हमारे यहां समयबोध जैसी चीज़ नहीं है, इतिहासबोध नहीं है, हम मिथकजीवी प्राणी हैं।
मुझे हैरत होती है कि हमारे यहां सिनेमाई संवेदना का किस तरह से अभाव है। मैं कोई भी हिंदी फिल्म देखते समय बेचैन हो जाता हूं। मुझे लगता है कि हमारे निर्देशक के पास कहने को कुछ नहीं है, इंगित करने को कुछ नहीं है, उसका स्पेस उसके नियंत्रण में नहीं है, वह स्पेस में आयाम नहीं रच पा रहा है, सिनेमा की लय उसकी पहुंच से बहुत दूर है। आप किसी भी मास्टर का काम उठाकर देख लीजिए, वर्नर हरसोग, अंतोनियोनी, ओजू, बर्गमैन, फ़ेलिनी, आप पाएंगे कि उनके सिनेमा और हमारे यहां जो बंबई में बनाया जाता है, उसमें सहस्राब्दियों का फ़ासला है। और यह बात मैं बिना किसी पूर्वग्रह के, दुनियाभर की सैकड़ों फिल्में देख डालने के बाद कह रहा हूं।
हमारे यहां सत्यजित राय ने कुछ अच्छा काम किया, वे जॉन फ़ोर्ड और ज्यां रेनुआं का अपना उस्ताद मानते हैं। रित्विक घटक फ़ेलिनी को अपना उस्ताद स्वीकारते हैं। इनके सिनेमा में कुछ क्षण आपको मिल सकते हैं। पथेर पांचाली देखें तो आप पाएंगे कि यहां निर्देशक का अपने कथासत्य और अपने कथादेश पर नियंत्रण है। पथेर पांचाली 1955 में बनी थी, एक शू-स्ट्रिंग बजट के साथ। आज 66 साल बाद भी हम पथेर पांचाली जैसी किसी फिल्म के आसपास नहीं पहुंच सके हैं।
भास्कर में जो मेरा लेख छपा था, उसकी मूल थीम यही थी। रंगमंच बनाम सिनेमा। ये दोनों कथासत्य को निरूपित करते हैं और विजुअल माध्यम हैं, लेकिन इन दोनों के ग्रामर में ज़मीन-आसमान का अंतर है। ब्रेसां ने अपनी किताब में पूरी ताक़त से इसे स्थापित किया है। मुझे लगता है हमारे सिनेमा की सबसे बड़ी त्रासदी आज भी यही है कि हम रंगमंच की आदत से मुक्त नहीं हो पाए हैं, इसीलिए हम लाउड और मेलोड्रैमिक हैं। हमारे यहां बैकग्राउंड स्कोर सुनें, संवादों की टोन सुनें, गाने सुनें। पश्चिम की फिल्मों में गाने नहीं होते, जिंदगी में भी नहीं होते। हमने एक नकली सिनेमाई संवेदना रची है। हम तालीपीट दृश्य विधान और संवाद योजना रचते हैं। यह बहुत बड़ी क्षति है। संवेदना के स्तर पर, अधिग्रहण के स्तर पर।
हमारी सांस्कृतिक बहुलता को देखते हुए मैं बहुत शिद्दत से यह महसूस करता हूं कि हम अपने क्षेत्रीय रंगों को लेकर बहुत सुंदर डॉक्यूमेंट्री फिल्में बना सकते हैं। कथाफिल्में नहीं, वृत्तचित्र। हरसोग ने दुनियाभर की नेटिव संस्कृतियों को लेकर इस दिशा में बड़ा काम किया है एक एंथ्रोपोलोजिकल दृष्टिकोण से।
ख़ैर, जैसा कि मैंने कहा यह एक बहुत व्यापक विषय है और ईमेल पर इस बारे में विस्तार से बात नहीं की जा सकती। मैं फिर दोहराता हूं, आपके विराट संकल्प के लिए मैं शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।
(नेशनल बुक ट्रस्ट ने सत्यजित राय के सिनेमा पर चिदानंद दासगुप्ता की एक किताब छापी है। वह शुरुआत करने के लिए उपयोगी हो सकती है। सिनेमा पर प्रमोद सिंह का यह ब्लॉग भी आपके लिए उपयोगी होगा http://cinema.blogspot.com/ ख़ासतौर पर इसमें सालभर पहले छपा वह लेख : सिनेमा का गल्प-सुशोभित शक्तावत
Is there any criteria for selection of a movie as classic or the guidelines that help identify a movie as classic. In scientific research publications there is a criteria as I work in a top research Institution and publish research too in Indian Journal of Medical Rersearch. Scientometrics is a branch of scientifically studying research and research output of individuals as well as institutions. Has anyone done some statistical analysis of the entire number of films produced in India since Alam Ara/Harishchandra that helped determine a movie as 'Classic' irrespective of the numbers that went to see a movie....its total earnings...........the number of days it ran etc. etc. These days it is hard to keep a tab on such numbers as lots of CDs/DVDs are sold in market and nobody is aware how many people see it or how many times it is exchanged between friends until it becomes obsolete or technically not feasible to watch as quality deteriorates with successive runs. I would be glad to know from you the methods through which we academically assess the worth of movie or from other popular view points. I have seen a few classic movies, particularly the SciFi movies on the TV as well as SciFi film festivals organized by American Centre at Delhi. Which elements go in for classifying a movie as classic? If there were a universal academic or statistical criteria it would enable me to categorize a small number of Haryanvi movies that I wish to evaluate. I wish to scientifically determine their status so that it cannot be challenged on flimsy or self-determined grounds. I could not locate such things on the NET and if there were a book that contained this information apart from the peer-status and qualifications, I would be glad. However, I suppose, in international film festivals certain criteria is applied to adjudge be best of the entries from countries. The selection criteria should be available at some place, including the internet.- Ranbir Singh रणबीर सिंह
स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी सिनेमा का पहला सोपान है। एक फ्रांसीसी फ़ोटोग्राफ़र है ऑनरी कार्तिए ब्रेसां- Henri Cartier Bresson. गूगल पर सर्च कीजिएगा। इस व्यक्ति को स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी का पितामह कहा जाता है। सत्यजित राय के सिनेमा के कई बिम्ब ऑनरी महोदय से प्रेरित हैं। किस फिल्म को कल्ट क्लासिक माना जाए, इसका कोई तय पैमाना तो है नहीं। जर्मन फिल्मकार हरसोग अक्सर एक्सटेटिक ट्रुथ की बात करते हैं। शायद वे विस्मय और आनंदारितेक को सिनेमा का एक महत्वपूर्ण तत्व मानते हैं। एक कभी नहीं देखा गया लैंडस्केप, कभी नहीं सोचा गया विचार।
तकनीक के स्तर पर क्रांतिकारी कदम उठाने वाली फिल्में क्लासिक मानी जाती रही हैं। जैसे बैटलशिप पोटेमकिन में आइजेंस्ताइन द्वारा किया गया मोंताज का प्रयोग। या सिटीजन केन में आर्सन वेल्स के डीप फ़ोकस। या ओजू के पिलो शॉट या स्टेटिक मूवमेंट या ज़मीनी शॉट। कुरोसावा के छापामार कैमरे, जो अप्रत्याशित दृश्य विधान रचते थे। गोदार के जम्प कट्स और उत्तर आधुनिक सीक्वेंस। बेला तार के मिनटों लंबे टेक। अंतोनियानी का बेहलचल सिनेमा। बर्गमैन के क्लोज़ अप। सत्यजित राय का प्रगीतात्मक यथार्थवाद। ये भी तकनीक के स्तर पर किए गए काम हैं। फिर विषय वस्तु है। ट्रीटमेंट है। बिम्ब विधान है।
इतालवी लेखक इतालो कल्वीनो ने कहा था कि हमें क्लासिक्स इसलिए पढ़ना या देखना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना उन्हें न पढ़ने या न देखने से बेहतर है। अलबत्ता क्लासिक्स का पैमाना तो ख़ैर उन्होंने नहीं ही बताया था। हमारे यहां शोले, मुग़ले आज़म को क्लासिक कहा जाता है। अभी रॉकस्टार आई तो उसे क्लासिक कहा गया। मुझे लगता है यह तुलनात्मक हो सकता है। यह आपके अवबोध की संपन्नता पर निर्भर करता है कि आप किसे क्लासिक मानते हैं। दुनियाभर का सिनेमा देखने से पहले मैं प्यासा या देवदास को क्लासिक समझता था, लेकिन आज इनके बारे में विचार करता हूं तो सिनेमा कला की दृष्टि से इन फिल्मों में कई जगह फांक नज़र आती है। संरचनागत संपूर्णता नहीं है।
रोजर एबर्ट की ग्रेट फिल्म्स सीरिज़ मशहूर है और पूरी दुनिया में उसे मानक माना जाता है। वह पूरी की पूरी इंटरनेट पर उपलब्ध है। वर्ष 2007 में जॉन रोलैंड ने टॉप सौ फिल्मों की सूची तैयार की थी। यह संपूर्ण सूची नहीं है और इस तरह की अनेक सूचियां अभी तक बनाई जा चुकी हैं। फिर भी यह सूची कई महत्वपूर्ण फिल्मों को कवर करती है। आप यदि इनमें से कुछ फिल्में प्राप्त कर पाएं तो आप तुलनात्मक रूप से समझ पाएंगे कि क्लासिक क्या है। जैसे जापानी फिल्मकार यासुजिरो ओजू की टोक्यो स्टोरी है। आप सबसे पहले यह फिल्म कहीं से प्राप्त कीजिए। इसे देखने के बाद हम बरबस कह उठते हैं, दिस इज़ क्लासिक, और जब हम ऐसा कहते हैं तो हम जाने-अनजाने क्लासिक के श्रेष्ठ उदात्त मानदंड भी तय कर रहे होते हैं, अलबत्ता उन्हें शायद इतनी अच्छी तरह डिफ़ाइन नहीं किया जा सकता।- सुशोभित शक्तावत
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Cinema in Haryana
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